धूप में चाँदनी।

aaधूप में चाँदनी। इस सृष्टि में सबकुछ परिवर्तनशील है। ठीक उसी तरह साहित्य में भी परिवर्तन हो रहे है। कहानी से अ.कहानी,कविता से अ.कविता ,ठीक उसी तरह ग़ज़ल ने भी अपना मिज़ाज बदला है। इस बदलाव को अपनाते हुए डा शंकर सोनाने ने ग़ज़ल की ओर भी रूख अख्तियार किया है। अपने अन्दाज़ में ग़ज़ल कहने का उनका अन्दाज़ अलग ही किस्म का है। रस,अलंकार,प्रतीक,बिम्ब भी समय के अनुसार बदल गए है तो छन्द और पैमाने ने भी किनारा करना उचित समझा । अब यह कहा जाता है कि ग़ज़ल भले ही मीटर में न हो लेकिन वह गेय होनी चाहिए। 1980 के  दशक के बाद बोलचाल के वाक्यों को भी गेयता मिलने लगी है फिर नई विधा की ग़ज़ल को तो मिलनी ही चाहिए।इसी को नज़र रखते हुए डा सोनाने ने आज़ाद ग़ज़ल कहने की कोशिश की है ।अब यह कोशिश कहाँ तक कामयाब है, आप भी पढ़कर देख लें।

Published in: on October 23, 2007 at 6:27 am

The URI to TrackBack this entry is: http://shankarsonane.wordpress.com/2007/10/23/75/trackback/

RSS feed for comments on this post.

Leave a Comment