‘मेरे तो गिरधर गोपाल
श्रीकृष्ण के प्रति मोहित डा कृष्णशंकर सोनाने बाल्यकाल से ही रहे हैं।उम्र के उत्तरार्ध तक उनका श्रीकृष्ण प्रेम बरकरार है। इसलिए तो उन्होने अपने नाम के पहले कृष्ण लगाकर उनके प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित किया है। बाल्यावस्था का श्रीकृष्ण प्रेम तक अधिक उमड़ आया जब उन्होने संगीता साहबजी को देखा। उन्हे लगा जब संगीता साहबजी इतनी अधिक सुन्दर है तो निश्चित ही श्रीकृष्ण इनसे भी अधिक सुन्दर होगे ही।बस,फिर श्रीकृष्ण के प्रति हृदय में विराजमान प्रेम का आधार संगीता साहबजी को देख देख भौतिक से अधिभौतिक प्रेम को साकार कर लिया।भौतिक संगीता साहबजी से अधिभौतिक संगीतासाहबजी तक का सफर श्रीकृष्ण प्रेम में आकर स्थापित हो गया । यह प्रेम भौतिक नहीं अपितु अधिभौतिक है इसलिए तो श्रीकृष्ण की प्रतिमा संगीताजी मे पाकर दिव्य प्रेम में डुबकी लगाते हुए डा कृष्णशंकर सोनाने पाये जाते है। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल ‘ उसी प्रेम का प्रसाद है। उन्होंने श्रीकृष्ण और संगीता साहबजी को एक ही दृष्टिकोण से देखा है और देख रहे है। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल ‘श्रीकृष्ण प्रेम की कृति के रूप में मानी जाएगी।
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