डा कृष्णशंकर सोनाने व्दारा लिखा गया उपन्यास ‘ गौरी ‘

aडा कृष्णशंकर सोनाने व्दारा लिखा गया उपन्यास ‘ गौरी ‘यह उपन्यास उनके व्दारा सन् 1985 में लिखा गया है किन्तु इस उपन्यास का प्रकाशन बीस वर्ष बाद 2007 में संभव हो पाया। ‘गौरी’उपन्यास नारी उत्पीड़न तथा शौर्य की अद्भुत दास्तान है। ग्रामीण परिवेश में भी नारी किस तरह अपने अधिकार के लिए लड़की है।असामाजिकता के बीच जीवित रहते हुए ठीक उसी तरह अपने कर्तव्य का पालन करती है जिस तरह पिता का आज्ञाकारी पुत्र करता है।पुत्र भले ही माता पिता के प्रति विमुख हो जाता है लेकिन ममतामयी बेटी कभी भी विमुख नहीं हुई है।  इतिहास गवाह है बेटियाँ अपने माता पिता ही नहीं बल्कि अपने परिवार के प्रति अधिकतर उत्तरदायित्व निभाते हुए पाई जाती है। गौरी भी एक ऐसा ही चरित्र है। उपन्यास पठनीय होने के साथ साथ संग्रहीणीय भी है।

Published in: on October 23, 2007 at 6:34 am Comments (0)

कुदरत का न्याय

aबड़ों के लिए लिखना जितना आसान होता है उससे कहीं अधिक कठीन होता है बच्चों के लिए लिखना ।डा कृष्णशंकर सोनाने ने बच्चों की ओर भी ध्यान दिया और उन्होंने बच्चों के लिए  शिक्षाप्रद कहालियाँ लिखी । यह कहानियाँ न केवल बच्चों को शिक्षा देती है बल्कि बड़ों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित करती है।

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क्रोध

aबड़ों के लिए लिखना जितना आसान होता है उससे कहीं अधिक कठीन होता है बच्चों के लिए लिखना ।डा कृष्णशंकर सोनाने ने बच्चों की ओर भी ध्यान दिया और उन्होंने बच्चों के लिए  शिक्षाप्रद कहालियाँ लिखी । यह कहानियाँ न केवल बच्चों को शिक्षा देती है बल्कि बड़ों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित करती है।

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वेदना

aप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो अक्षय कुमार जैन ने ठीक ही कथा कि डा शंकर सोनाने प्रेम के कवि है। ‘ वेदना ‘ प्रबंध काव्य के प्रथम संस्करण का प्रकाशन 1976 में हुआ था जिस समय उनकी आयु मात्र चौबीस वर्ष की थी। प्रख्यात समीक्षक,किसी, ने कहा था कि ‘ वेदना ‘ पढ़कर हमें ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि वे जयशंकर प्रसाद की कृति ‘आँसू’ पढ़कर प्रतीत होता है। ‘ वेदना ‘प्रबंध काव्य पढ़ना ही ‘आँसू’ पढ़ने जैसा है। इस अव्दितीय कृति की ओर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया है। अनेकों बार पढ़ने के लिए मन करता है।

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‘दो शब्दों के बीच

a‘दो शब्दों के बीच ‘ कविता संकलन में एक कविता है,विनय दुबे जब हंसते हैं। इस कविता को पढ़ते हुए विनय दुबे खूब हँसे थे इतना हँसे थे कि विजयबहादुर सिंह जी वास्तव में डांडिया करने लग गए थे। इस संकलन में विविध विषयों को समाहित किया गया है। सामाजिक,आर्थिक और राजनीति को खूब आड़े हाथों लिया है। अपने समय की प्रतिकूल और विषमताओं को अच्छी तरह से जानने में डा सोनाने ने कोई कोताही नहीं की है। यह सही है कि यह संकलन कुछ लोगों को भीतर तक चूभ जाता है तो अधिकतर लोगों को सहलाता भी है। मनुष्य की संवेदनाएं आज दोहरी हो गई है।भीतर कुछ है तो बाहर कुछ है। डा सोनाने इसे खूब अच्छी तरह से जानते है। बोलते बहुत कम है तो वार उससे अधिक करते है।
    हाँ,इस संग्रह में भोपाल के कवियों को ताज़ पहनाने में पीछे नहीं रहे हैं । पूर्णचन्द्र रथ ने कभी सिगरेट नहीं पी किन्तु पर लिखी कविता को पढ़कर उन्होने भी एक बार सिगरेट का स्वाद अवश्य चखा है। अतः कविता वही होती है जो अन्तःकरण में पहुँचकर पाठक को उत्तेजित कर दें।डा सोनाने यहाँ सफल होते है।

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धूप में चाँदनी।

aaधूप में चाँदनी। इस सृष्टि में सबकुछ परिवर्तनशील है। ठीक उसी तरह साहित्य में भी परिवर्तन हो रहे है। कहानी से अ.कहानी,कविता से अ.कविता ,ठीक उसी तरह ग़ज़ल ने भी अपना मिज़ाज बदला है। इस बदलाव को अपनाते हुए डा शंकर सोनाने ने ग़ज़ल की ओर भी रूख अख्तियार किया है। अपने अन्दाज़ में ग़ज़ल कहने का उनका अन्दाज़ अलग ही किस्म का है। रस,अलंकार,प्रतीक,बिम्ब भी समय के अनुसार बदल गए है तो छन्द और पैमाने ने भी किनारा करना उचित समझा । अब यह कहा जाता है कि ग़ज़ल भले ही मीटर में न हो लेकिन वह गेय होनी चाहिए। 1980 के  दशक के बाद बोलचाल के वाक्यों को भी गेयता मिलने लगी है फिर नई विधा की ग़ज़ल को तो मिलनी ही चाहिए।इसी को नज़र रखते हुए डा सोनाने ने आज़ाद ग़ज़ल कहने की कोशिश की है ।अब यह कोशिश कहाँ तक कामयाब है, आप भी पढ़कर देख लें।

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‘कोरी किताब

aजब ‘कोरी किताब ‘ की प्रति श्री चन्द्रकान्त देवताले जी के हाथों में पहुँची तो उन्होंने डा सोनाने को पत्र लिखकर  जताया कि उनके हाथों में आते आते कोरी किताब कविताओं से भर गई। किताब में भोपाल पर लिखा गीत बहुत लाजवाब हैः-.
          अय,शहरे भोपाल तुझको मेरा सलाम
            तेरी गलियों में बसा जन्नत का धाम..
भोपाल की गलियों में जन्नत बसा हुआ है। वास्तव में जो एक बार भोपाल आ जाता है ,वह भोपाल का ही होकर रह जाता है। हालाकि इस कविता संग्रह में गीत,ग़ज़ल,कविताएं आदि है। हृदय के किसी कोने में अवश्य ही यह किताब अपनी जगह बनाने की कोशिश में है।जल्द ही यह आरजू  भी पूरी हो जाएगी।

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निर्वासिता’

a‘निर्वासिता’ नारी केन्द्रित यह कविता संग्रह पठनीय है। नारी मुक्ति आन्दोलन लगातार चल रहा है। सन् 1980 के बाद से  नारी विमर्श पर बहुत काम हो रहा है। यह विषद विषद है। इस सम्बन्ध में विस्तृत चर्चाएं लगातार चल रही है, चलती रहेगी। क्या वास्तव में नारी आजाद है यदि वह आजाद है तो अब तक वह आज़ाद क्यों नहीं हो पा रही है। जो आज़ादी नारियों को प्राप्त है उससे नारियों को लाभ कम किन्तु हानि अधिक हो रही है। आजादी के नाम पर या तो नारियों का शोषण हो रहा है या नारियाँ आजादी का अनुचित लाभ उठा रही है। जिन्हे वास्तव में आजादी की आवश्यकता है उन्हे आजादी नहीं मिल पा रही है। यदि देखा जाय तो नारी ही नारी की दुश्मन है।पुरूष अपनी ओर से कभी भी नारी को प्रताड़ित नहीं करता जब तक कि अन्य नारी पुरूष को नारी के विरूद्ध हथियार नहीं उठाती।नारियों ने अन्य नारी को प्रताड़ित करने के लिए पुरूष का सहारा लिया और पुरूषों पर नारियों की प्रताड़ना का आरोप लगाया जाता है। उदाहरण..सास बहु,देवरानी जेठानी,सौतेली माँए आदि।डा सोनाने ने ‘निर्वासिता’ में नारियों के चरित्र पर भी लिखा है सिक्के के दोनों पहलुओं को देखा है फिर लिखा है।

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‘किशोरीलाल की आत्महत्या’

a‘किशोरीलाल की आत्महत्या’ जिस तरह नारी विमर्श पर 1980 के दशक से विमर्श प्रारंभ हुआ ठीक उसी तरह से दलित विमर्श पर भी विमर्श प्रारंभ हुआ है।हालांकि साहित्तेतर यह विमर्श डा अंबेडकर से प्रारंभ हुआ है लेकिन महात्मा गाँधी से लेकर अब तक तमाम महात्माओं ने दलित उत्थान पर बहुत कहा है। आज जो स्थिति है वह पहले की तरह तो नहीं है फिर भी आंचलिक गाँवों में यह स्थिति ज्यों की त्यौं बनी हुई है।इसके लिए कौन जिम्मेदार है।कहा नहीं जा सकता।संभवतःयह मनुवादियों की देर है जो सदियों से चली आ रही है।इतनी आसानी से इससे निज़ाद पाना कठिन हैफिर भी प्रयास जारी है। दलितों को  भले ही इससे लाभ न मिला हो किन्तु दलितों के नाम से रोटियाँ खूब सेंकी जा रही है। दलित की परिभाषा बदल देनी चाहिए तब ही वास्तविक दलित को लाभ मिल सकता है। डा सोनाने ने दलितों की श्रेणियों को परखने की बात की है वास्तविक दलित की खोज जब तक नहीं होती यह समस्या बनी रहेगी।

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वैशाली सोनाने

aबाल भवन,भोपाल व्दारा आयोजित नाटक कार्यशाला में  बेट वैशाली सोनाने अभ्यास करते हुए दाहिए से नम्बर एक

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